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भक्तिकाल के महान संत कबीर *डॉ शाहिद अली*

*संत कबीर दास हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की निर्गुण ज्ञानमार्गी शाखा के सबसे महान और प्रभावशाली कवि-संत थे। उन्होंने 15वीं शताब्दी में अपने विचारों और रचनाओं के माध्यम से भारतीय समाज को एक नई दिशा दी। कबीर केवल एक आध्यात्मिक संत ही नहीं, बल्कि एक प्रखर समाज सुधारक और क्रांतिकारी विचारक भी थे। कबीर का जन्म सन् 1398 में काशी (वाराणसी) में माना जाता है। उनके जन्म को लेकर कई किंवदंतियाँ हैं, परंतु वे लहरतारा तालाब के पास पाए गए थे। कहा जाता है कि उनका पालन-पोषण ‘नीरू’ और ‘नीमा’ नाम के एक निर्धन मुस्लिम जुलाहा दंपत्ति ने किया। उन्होंने स्वामी बनारस में स्वामी रामानंद को अपना गुरु बनाया, जिनसे उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान की दीक्षा ली। कबीर साहब जीवनभर सादगी से रहकर कताई-बुनाई का काम करते रहे। निर्गुण ब्रह्म के उपासक कबीर मूर्ति पूजा, अवतारवाद और कर्मकांड के सख़्त खिलाफ थे। वे ईश्वर को घट-घट वासी यानी हर कण में समाया हुआ और निराकार मानते थे इसलिए उन्होंने राम और अल्लाह को एक ही परम सत्य के दो नाम बताया। उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों में व्याप्त कुप्रथाओं पर समान रूप से तीखा प्रहार किया। कबीर ने समाज में ऊंच-नीच और जातिगत भेदभाव का कड़ा प्रतिवाद करते हुए मानवता और समानता का संदेश दुनिया को दिया। कबीर निरक्षर थे, उन्होंने स्वयं कहा था— “मसि कागद छुऔ नहीं, कलम गही नहिं हाथ”. उनके शिष्यों ने उनकी वाणी और उपदेशों को संकलित किया । कबीर की प्रामाणिक रचनाओं का मुख्य संग्रह ‘बीजक’ कहलाता है, जिसके तीन भाग हैं। पहला भाग साखी है, इसमें दोहा छंद का प्रयोग कर नीति, समता और ज्ञान की बातें सिखाई गई हैं। दूसरा भाग सबद (शब्द) है जिसमें गेय पद हैं, इस भाग में कबीर की प्रेम साधना और ईश्वरीय भक्ति का सुंदर वर्णन है। तीसरे भाग में रमैनी को लिया गया है जिसमें चौपाई शैली में कबीर के दार्शनिक और रहस्यवादी विचार देखने को मिलते हैं। कबीर की भाषा को ‘सदुक्कड़ी’ या ‘पंचमेल खिचड़ी’ कहा जाता है।उनकी भाषा में अवधी, भोजपुरी, पंजाबी, राजस्थानी, अरबी और फारसी जैसी कई भाषाओं के शब्दों का अनूठा मेल है। जीवन का अंतिम समयकबीर ने काशी में बिताया, लेकिन अपने अंतिम दिनों में वे मगहर चले गए। उस समय यह अंधविश्वास था कि काशी में मरने से स्वर्ग और मगहर में मरने से नरक मिलता है। कबीर ने इस सोच को तोड़ते हुए जानबूझकर मगहर को चुना और सन् 1518 में वहीं महाप्रयाण किया। उनकी मृत्यु के बाद उनके हिंदू और मुस्लिम शिष्यों ने उनके कफन के स्थान पर मिले फूलों को आपस में बांटकर अपनी-अपनी परंपरा से उनका अंतिम संस्कार किया। संत कबीरदास का जीवन और उनका साहित्य आज सदियों बाद भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उनके समय में था। उनके दोहे आज भी समाज को नैतिकता, भाईचारे और आडंबरहीन जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। वे भारतीय संस्कृति के एक ऐसे अनमोल रत्न हैं, जिन्होंने धर्मों की दीवारों को गिराकर विशुद्ध मानवता का मार्ग दिखाया। संत कबीर दास जी के कुछ सबसे प्रसिद्ध दोहे, उनके अर्थ और उनके सामाजिक सुधारों से भरा जीवन दर्शन आज भी प्रासंगिक है। हिन्दू-मुस्लिम कट्टरपंथियों को चुनौती देते कबीर के दोहों में ललकार है, काकर पाथर जोरि कै, मस्जिद लई बनाय।ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥कबीर दास जी कहते हैं कि कंकड़-पत्थर जोड़कर मस्जिद तो बना ली गई है, जिस पर चढ़कर मुल्ला ज़ोर-ज़ोर से अज़ान देता है, क्या ईश्वर बहरा है जो उसे इतनी ज़ोर से पुकारने की ज़रूरत है? इसलिए कबीर मन की सच्ची और शांत भक्ति पर ज़ोर देते हैं। मूर्ति पूजा और अंधविश्वास को लेकर कहते हैं,पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजूं पहार।याते तो चाकी भली, पीस खाय संसार॥कबीर कहते हैं कि यदि पत्थर पूजने से भगवान मिलते हैं, तो मैं पूरे पहाड़ की पूजा करने के लिए तैयार हूँ लेकिन उस पत्थर की मूर्ति से तो घर की वह पत्थर की चक्की कहीं बेहतर है, जिससे अनाज पीसकर पूरा संसार अपना पेट भरता है। कबीर में वाणी की मधुरता है और आपसी प्रेम की शीतल छांव भी है, कहते हैं, कि ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय।औरन को शीतल करै, आपहु शीतल होय॥कबीर जी सीख देते हैं कि हमें अपने अहंकार को त्यागकर हमेशा ऐसी मधुर भाषा बोलनी चाहिए, जिससे सुनने वाले को सुख और शांति मिले और साथ ही खुद का मन भी प्रसन्न रहे। जातिवाद और ऊंच-नीच का खंडन करते हुए कबीर का खरापन है, जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥यानी किसी विद्वान या संत की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान से होनी चाहिए. असली महत्व तलवार की धार का होता है, उसकी बाहरी म्यान का नहीं।कबीर केवल एक कवि नहीं बल्कि भारतीय इतिहास के सबसे निर्भीक समाज सुधारक थे। उनका पूरा जीवन सामाजिक बुराइयों को मिटाने में बीता। कबीर के समय में समाज धार्मिक कट्टरता, अंधविश्वास और अंधभक्ति की जकड़ में था। उन्होंने बिना किसी डर के हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के ठेकेदारों की गलत नीतियों की खुलकर आलोचना की। कबीर का मानना था कि ईश्वर ने सभी मनुष्यों को एक समान बनाया है. उन्होंने जन्म के आधार पर किसी को श्रेष्ठ या नीच मानने की व्यवस्था को पूरी तरह खारिज कर दिया।कबीर स्वयं एक जुलाहा थे और वे मेहनत करके अपनी आजीविका कमाते थे। उन्होंने समाज को यह सिखाया कि भक्ति या ज्ञान प्राप्त करने के लिए संसार को छोड़ने या भीख मांगने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि कर्म करते हुए भी ईश्वर को पाया जा सकता है।रूढ़िवादिता को समाप्त करने के लिए उन्होंने समाज में फैली गलत धारणाओं को तोड़ने के लिए तार्किक बातें कहीं।

उनका मगहर जाकर प्राण त्यागना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि वे केवल उपदेश नहीं देते थे, बल्कि उन्हें अपने जीवन में जीते भी थे। कवि संत कबीर दास के साहित्य में ‘रहस्यवाद’ का बहुत ही अनूठा और महत्वपूर्ण स्थान है। हिंदी साहित्य में उन्हें रहस्यवाद का जनक भी माना जाता है। रहस्यवाद का अर्थ है, आत्मा और परमात्मा के बीच के छिपे हुए, गहरे और अलौकिक संबंध को महसूस करना तथा उसे शब्दों में व्यक्त करना है। कबीर का रहस्यवाद किताबी ज्ञान पर नहीं, बल्कि उनके अपने सीधे अनुभव पर आधारित था। उनके रहस्यवाद की कुछ खास विशेषताएं थीं जैसे साधनात्मक रहस्यवाद। कबीर पर नाथपंथियों और सिद्धों का गहरा प्रभाव था, उन्होंने अपनी रचनाओं में ‘इड़ा’, ‘पिंगला’, ‘सुषुम्ना’ नाड़ियों, ‘षट्चक्र’ और ‘शून्य चक्र’ का वर्णन किया है। कबीर कहते हैं कि जब साधक योग साधना के माध्यम से अपने भीतर के दशम द्वार तक पहुँचता है, तो वहाँ अमृत की वर्षा होती है, जिसे आत्मा पीकर तृप्त हो जाती है। इसी प्रकार भावनात्मक रहस्यवाद। कबीर का साधना मार्ग केवल कठिन योग नहीं था, बल्कि उसमें ईश्वर के प्रति गहरा प्रेम भी था। उन्होंने आत्मा और परमात्मा के संबंध को दुनिया के सबसे पवित्र रिश्तों के माध्यम से समझाया है। इसी तरह ईश्वर से दूर रहने पर आत्मा की जो तड़प होती है, उसे कबीर ने बहुत ही मार्मिक ढंग से कहा है, अँखियाँ तो झाईं परी, पंथ निहारि-निहारि।जीभड़ियाँ छाला पड़्या, नाम पुकारि-पुकारि॥जिसका अर्थ है कि परमात्मा की राह देखते-देखते आँखों के आगे अंधेरा छा गया है और उनका नाम पुकारते-पुकारते जीभ पर छाले पड़ गए हैं, फिर भी प्रियतम के दर्शन नहीं हुए।कबीर ईश्वर से मिलकर उनके साथ एक हो जाना चाहते हैं, जहाँ दोनों के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है। कबीर ने अपने रहस्यवादी अनुभवों को व्यक्त करने के लिए ‘उलटबाँसियों’ का प्रयोग किया है। ये ऐसी रचनाएँ हैं जो ऊपर से देखने पर अजीब या उल्टी लगती हैं, लेकिन उनका आंतरिक आध्यात्मिक अर्थ बहुत गहरा होता है जैसे, कि एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढ़ा सिंह चरावै गाई।पहले पूत पीछे भई माई, चेला के गुरु लागै पाई॥तात्पर्य यह है कि सिंह गाय चरा रहा है, बेटा पहले हुआ माँ बाद में, और गुरु चेले के पैर छू रहा है। इसका आध्यात्मिक अर्थ है कि ‘सिंह’ मन या आत्मा है जो इंद्रियों रूपी ‘गायों’ को वश में कर रहा है। ज्ञान (बेटा) पैदा होने पर माया (माँ) का अंत हो जाता है। कबीर का अद्वैत भाव था कि आत्मा और परमात्मा दो अलग चीजें नहीं हैं। जैसे पानी का घड़ा पानी में ही डूब जाता है, वैसे ही आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है।हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की निर्गुण ज्ञानमार्गी शाखा के सबसे महान, प्रभावशाली और क्रांतिकारी कवि-संत कबीर ने 15वीं शताब्दी में अपने विचारों, साखियों और पदों के माध्यम से भारतीय समाज को एक नई दिशा दी। कबीर केवल एक आध्यात्मिक संत ही नहीं, बल्कि एक प्रखर समाज सुधारक और अंधविश्वासों पर चोट करने वाले निर्भीक विचारक भी थे। कबीर की वाणी आज भी समाज को नैतिकता, भाईचारे, धार्मिक सहिष्णुता और आडंबरहीन जीवन जीने की प्रेरणा देती है। कबीर भारतीय संस्कृति के एक ऐसे अनमोल रत्न हैं, जिन्होंने धर्मों की दीवारों को गिराकर विशुद्ध मानवता का मार्ग दिखाया। आज भी मगहर में कबीर की समाधि और मज़ार एक ही परिसर में अगल-बगल बनी हुई हैं, जो सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा प्रतीक हैं। आमतौर पर माना जाता है कि साधु-संत संसार और परिवार को छोड़कर वैराग्य धारण कर लेते हैं, लेकिन कबीर दास जी इसके बिल्कुल विपरीत थे। वे एक ‘गृहस्थ संत’ थे। उनका मानना था कि ईश्वर को पाने के लिए संसार या परिवार का त्याग करना जरूरी नहीं है।

(लेखक सुप्रसिद्ध मीडिया शिक्षाविद् एवं कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

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